✎ जनजातीय भूमि अधिकार एवं सहमति के लिए संविधान, वन अधिकार अधिनियम 2006 एवं PARIVESH पोर्टल महत्वपूर्ण हैं।
प्रासंगिकता — Banking, SSC & RBI Grade B exams: Polity & Governance
जनजातीय भूमि अधिकार और परियोजनाओं में सहमति का मुद्दा भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्य सूची में शामिल है, जिसके तहत भूमि प्रबंधन और अधिग्रहण की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है। अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (एफआरए) के अनुसार, वन भूमि के किसी भी गैर-वानिकी उपयोग के लिए ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है, जबकि वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के तहत केंद्र सरकार की अंतिम मंज़ूरी भी आवश्यक है। केंद्र सरकार द्वारा वन भूमि के विपथन संबंधी प्रस्तावों की ऑनलाइन निगरानी *परिवेश* पोर्टल के माध्यम से की जाती है, जिसमें प्रभावित वन संसाधनों और परियोजना विवरणों का ब्यौरा उपलब्ध रहता है। हालांकि, भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास के विवादों का केंद्रीय स्तर पर कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता, क्योंकि यह राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों का संरक्षण किया जाए, विशेषकर एफआरए की धारा 4(5) के तहत, जिसमें दावेदारों को वन भूमि से तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक उनके अधिकारों की मान्यता और सत्यापन पूरा नहीं हो जाता।
इस विषय का महत्व बैंकिंग, एसएससी और आरबीआई ग्रेड बी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यधिक है, क्योंकि इसमें भूमि अधिकार, वन संरक्षण, ग्राम सभा की भूमिका और केंद्र-राज्य संबंध जैसे संवैधानिक एवं प्रशासनिक पहलुओं का समावेश है। परीक्षाओं में इस तरह के प्रश्न भूमि अधिग्रहण अधिनियम, वन अधिकार अधिनियम, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 और संविधान की सातवीं अनुसूची जैसे विषयों से पूछे जाते हैं। इसके अतिरिक्त, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा वन भूमि के उपयोग संबंधी ऑनलाइन पारदर्शिता (*परिवेश* पोर्टल) और केंद्र-राज्य समन्वय जैसे नवीनतम पहलुओं को भी ध्यान में रखना आवश्यक
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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