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जैव-ई3 नीति जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) द्वारा तैयार की गई एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसका उद्देश्य जीवाश्म-आधारित कच्चे माल के स्थान पर जैव-आधारित विकल्पों के विकास को बढ़ावा देना है। इस नीति के अंतर्गत पैमाने, उपज और प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर के आधार पर मापनीय लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, जिससे आयात निर्भरता कम की जा सके। डीबीटी द्वारा शुरू किए गए डिजिटल पोर्टल ‘सुजीविका’ के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित आयात संबंधी आंकड़े उपलब्ध कराए गए हैं, जो स्वदेशी जैव-आधारित उत्पादों की पहचान में सहायक हैं। इसके अतिरिक्त, कृषि अवशेषों, नगर निकायों से निकलने वाले जैविक कचरे और औद्योगिक जैवजन्य अपशिष्ट को उन्नत ईंधन, रसायनों और सामग्रियों में परिवर्तित करने के लिए अनुसंधान और पायलट परियोजनाओं को सहायता प्रदान की गई है। इन पहलों से भूमि उपयोग में कमी, नवीकरणीयता को बढ़ावा, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और अपशिष्ट से मूल्य सृजन जैसे पर्यावरणीय परिणाम प्राप्त होने की संभावना है।
जैव-ई3 नीति का पर्यावरणीय प्रभाव बहुत व्यापक है, क्योंकि यह चक्रीय अर्थव्यवस्था और नेट-जीरो उत्सर्जन के सिद्धांतों के अनुरूप है। इस नीति के माध्यम से जैव-विनिर्माण मूल्य श्रृंखला में स्थिरता को एकीकृत किया जा रहा है, जिससे स्वदेशी स्वच्छ प्रौद्योगिकी समाधानों का विकास किया जा सके। सरकार ने तकनीकी विशेषज्ञों, विषयगत विशेषज्ञ समूहों और हितधारकों के साथ परामर्श करके ऐसी पहलों का आकलन किया है, जो कार्बन उत्सर्जन में कमी और नेट-जीरो प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में योगदान दे सकती हैं। इसके अतिरिक्त, सुंदरबन जैसे क्षरित पारिस्थितिकी तंत्र के जैव-पुनर्स्थापन, एकल-उपयोग प्लास्टिक के विकल्प और कार्बन कैप्चर उपयोग संबंधी एकीकृत जैव-विनिर्माण जैसी पहलों को भी सहायता प्रदान की गई है। यह नीति न केवल पर्यावरण
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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