✎ मंदिरों द्वारा हाथियों के अधिग्रहण पर रोक लगाने वाले आदेश को उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया, जिससे मंदिरों के अधिकार सुरक्षित हुए।
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**मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के मंदिरों द्वारा हाथियों के अधिग्रहण पर रोक लगाने वाले आदेश को खारिज किया**
मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने बुधवार (2 सितंबर, 2026) को एकल न्यायाधीश के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें राज्य के किसी भी मंदिर को और हाथी अधिग्रहित करने से रोका गया था तथा सरकार को मंदिरों एवं निजी संस्थानों में रखे गए सभी हाथियों को सरकारी पुनर्वास केंद्रों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश सुष्रुत अरविंद धर्माधिकारी तथा न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने कहा कि यदि कोई आदेश उन व्यक्तियों के विरुद्ध पारित किया जाता है जो कार्यवाही के पक्षकार नहीं हैं तथा जिन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया हो, तो ऐसा आदेश न्यायिक दृष्टि से कायम नहीं रह सकता। न्यायालय ने राज्य सरकार तथा तिरुचchendुर सुब्रमण्यस्वामी मंदिर प्रबंधन की ओर से दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि एकल न्यायाधीश द्वारा 27 फरवरी, 2023 को पारित आदेश में राज्य अथवा संबंधित मंदिरों को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था, जिससे वह अवैध हो गया।
न्यायालय ने यह भी माना कि तमिलनाडु कैप्टिव एलिफेंट्स (मैनेजमेंट एंड मेंटेनेंस) रूल्स, 2011, जो वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 64(2)(एफ) के तहत बनाए गए हैं, मंदिरों सहित निजी संस्थानों में रखे गए हाथियों के रखरखाव, देखभाल तथा उपयोग के लिए एक पूर्ण कानूनी ढांचा प्रदान करते हैं। नियम 3 के तहत मंदिरों को दूसरों द्वारा दान किए गए हाथियों को ग्रहण करने की अनुमति है। न्यायालय ने कहा कि अधीनस्थ विधान का वैध रूप से बनाया गया ऐसा नियम तब तक कानून का हिस्सा बना रहता है जब तक उसे किसी सक्षम मंच द्वारा निरस्त न किया जाए अथवा स्वयं नियम बनाने वाले प्राधिकारी द्वारा संशोधित न किया जाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्तिगत मामले में निर्णय देते समय न्यायालय ऐसे नियम को प्रभावी रूप से निरस्त करने वाला
स्रोत: The Hindu
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