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A ‘superior’ CEC renders Election Commissioners ‘non-functional’, Supreme Court had warned — labelled illustration

✎ चुनाव आयोग में बहुसदस्यीय निर्णय प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।

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प्रासंगिकता — Banking, SSC & RBI Grade B exams: Polity

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सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1991 में दिए गए अपने एक फैसले में चेताया था कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) स्वयं को श्रेष्ठ समझकर अपने निर्णयों को अंतिम मानता है, तो अन्य चुनाव आयुक्त (ईसी) “गैर-कार्यात्मक या सजावटी” बनकर रह जाएंगे। न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग के “अनन्य एवं अनियंत्रित” अधिकार एक व्यक्ति के हाथों में सौंपने से लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का उल्लंघन होगा। न्यायालय ने बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था कि विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग एक व्यक्ति के बजाय समूह द्वारा किया जाना चाहिए, ताकि किसी एक व्यक्ति पर अत्यधिक दबाव न पड़े। इस फैसले की भावना को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2023 में पारित *मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम* की धारा 18 में भी सर्वसम्मति या बहुमत से निर्णय लेने का प्रावधान किया गया है। यह व्यवस्था न केवल चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है, बल्कि लोकतंत्र के प्रति इसकी जवाबदेही भी बढ़ाती है। हाल ही में सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठे आरोपों ने इस बहस को पुनर्जीवित कर दिया है, जहां विपक्ष द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग की मांग उठाई गई है।

इस मामले का महत्व बैंकिंग, एसएससी एवं आरबीआई ग्रेड बी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यधिक है, क्योंकि इसमें संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, उनकी कार्यप्रणाली एवं जवाबदेही जैसे विषय शामिल हैं। परीक्षाओं में अक्सर बहु-सदस्यीय संस्थाओं (जैसे चुनाव आयोग, लोक सेवा आयोग) के महत्व, उनके निर्णय-निर्माण प्रक्रिया एवं न्यायिक हस्तक्षेप जैसे प्रश्न पूछे जाते हैं। इसके अतिरिक्त, चुनाव आयोग की भूमिका, उसके अधिकार क्षेत्र एवं सीईसी की भूमिका पर भी सवाल बन सकते हैं। ऐसे मामलों से उम्मीदवारों को संविधान के अनुच्छेद 324, न्यायिक सक्रियता एवं लोकतंत्र के सिद्धांतों की गहरी समझ विकसित करनी चाहिए, जो परीक्षाओं में सफलता के लिए आवश्यक है।

स्रोत: The Hindu


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