✎ करुण नियुक्ति नीति के माध्यम से पीड़ित परिवारों को सरकारी नौकरी देने का मामला न्यायालयों के माध्यम से आगे बढ़ रहा है।
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सुप्रीम कोर्ट ने करूर स्टैम्पिड पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरियां देने के आदेश को रद्द करने वाले मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति जे.बी. पार्डीवाला ने पूछा कि सरकार द्वारा ऐसे परिवारों को “कुछ राहत” देने में क्या गलत है जिन्होंने इतनी बड़ी त्रासदी झेली है। उन्होंने कहा कि राजनीति को इसमें शामिल न करें, कई लोगों की मौत हुई है। यदि सरकार ने नौकरियां देने का फैसला किया है, तो फिर इसका विरोध कौन कर रहा है? अगर परिवार में एकमात्र कमाऊ सदस्य की मौत हो गई है, तो क्या सरकार को बेटे, बेटी या पत्नी को उनकी योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं देनी चाहिए? न्यायमूर्ति ने कहा कि कई परिवारों में एकमात्र रोजगार प्राप्त करने वाला सदस्य स्टैम्पिड में मारा गया होगा। बता दें कि 27 सितंबर 2025 को तमिलनाडु के करूर में टीवीके पार्टी के रोड शो के दौरान हुई भगदड़ में 41 लोगों की मौत हुई थी और लगभग 100 लोग घायल हुए थे।
तमिलनाडु सरकार ने अदालत में दलील दी थी कि ये नौकरियां मानवीय आधार पर दी गई थीं, लेकिन उच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए कहा था कि करुणा नियुक्तियों के लिए विशिष्ट दिशानिर्देश मौजूद हैं जिन्हें राज्य सरकार द्वारा दरकिनार नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने चेताया था कि अगर इस तरह के फैसलों को स्वीकार किया गया तो इससे अन्य मामलों में भी ऐसी नियुक्तियों का रास्ता खुल सकता है। न्यायालय ने कहा था कि सरकारी विभागों में करुणा नियुक्तियों के लिए पहले से ही वेटिंग लिस्ट मौजूद हैं और नियुक्तियां वरिष्ठता के आधार पर होनी चाहिए, न कि तत्काल राहत देने के उद्देश्य से। उच्च न्यायालय ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन बताया था। राज्य सरकार ने अपना अधिकार अनुच्छेद 162 (राज्य की कार्यपालिका शक्ति) के तहत बताया था, लेकिन उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी भी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग संविधान की सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए।
इस मामले की प्रासंगिकता ब
स्रोत: The Hindu
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