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प्रासंगिकता — Banking, SSC & RBI Grade B exams: Polity & Governance

**तीसरी भाषा के दृष्टिकोण को स्कूल कितना पूरा कर पा रहे हैं?**

भारत में कक्षा 10 में तीसरी भाषा लागू करने के फैसले पर शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों के बीच बहस चल रही है। जहाँ एक तरफ इसे बहुभाषी कौशल विकसित करने का सुनहरा अवसर बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसे विद्यार्थियों पर अतिरिक्त बोझ मानने वालों की चिंता भी जायज़ है। बहुभाषी व्यक्तियों में स्मृति, समस्या-समाधान कौशल और विविध दृष्टिकोण अपनाने की क्षमता बढ़ जाती है, साथ ही वे देश की सांस्कृतिक विविधता को बेहतर समझ पाते हैं। लेकिन इस नीति के क्रियान्वयन में कई व्यावहारिक चुनौतियाँ भी हैं, जैसे प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री का अभाव और क्षेत्रीय भाषाओं के पाठ्यक्रमों में एकरूपता का न होना। अगर इसे केवल पाठ्यपुस्तकों और परीक्षाओं तक सीमित रखा गया, तो इसका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। इसके बजाय कहानी, नाटक, संगीत, संवाद और डिजिटल संसाधनों के माध्यम से भाषा सीखने को रोचक बनाना होगा, ताकि विद्यार्थी उसे आत्मसात कर सकें।

बैंकिंग, एसएससी और आरबीआई ग्रेड बी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए यह विषय इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि बहुभाषी कौशल न केवल सामान्य जागरूकता का हिस्सा बनता है, बल्कि सरकारी नौकरियों में भी इसकी माँग बढ़ रही है। उदाहरण के लिए, आरबीआई ग्रेड बी में भाषा से संबंधित प्रश्नों के साथ-साथ बहुसांस्कृतिक समझ का परीक्षण किया जाता है, जो तीसरी भाषा नीति के उद्देश्यों से मेल खाता है। इसी तरह, एसएससी की परीक्षाओं में भी क्षेत्रीय भाषाओं के ज्ञान का महत्व बढ़ रहा है। अगर स्कूल इस नीति को प्रभावी ढंग से लागू कर पाते हैं, तो आने वाले समय में प्रतियोगी परीक्षाओं में भाषा संबंधी प्रश्नों के स्वरूप में बदलाव देखा जा सकता है।

स्रोत: Hindustan Times


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