✎ दिल्ली में छात्रों की सुरक्षा के लिए छात्रावास नीति और नियमन की तत्काल आवश्यकता है।
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**हाल ही में सत्य निकेतन छात्रावास ढहने की घटना के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें दिल्ली सरकार से समयबद्ध नीति बनाने तथा दिल्ली विश्वविद्यालय को अपने प्रत्येक कॉलेज में छात्रावास सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश देने की मांग की गई है। राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई) के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ द्वारा दायर इस याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए प्रस्तुत किया गया था, किंतु न्यायालय ने इसे तुरंत सूचीबद्ध करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय ने अधिवक्ता विमल त्यागी से पूछा, “क्या इस प्रकार का अंतरिम आदेश दिया जा सकता है? इसे कल लिया जाएगा। अनावश्यक रूप से अपना समय बर्बाद न करें। क्या ऐसा निर्देश दिया जा सकता है?” याचिका पर बुधवार को सुनवाई होगी। इससे पूर्व सोमवार को एक अन्य याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने टिप्पणी की थी कि भवन ढहने की जिम्मेदारी केवल पीजी मालिक की नहीं, बल्कि दिल्ली विश्वविद्यालय एवं नागरिक निकायों की भी है, तथा छात्रों के लिए उपलब्ध छात्रावासों की “पूर्णतः अपर्याप्त” संख्या को लेकर चिंता जताई थी। न्यायालय ने एमसीडी को निर्देश दिया था कि सभी पीजी एवं छात्रावासों वाले भवनों का निरीक्षण कर एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करे कि क्या निर्माण के दौरान आवश्यक अनुमति एवं भवन उपनियमों का पालन किया गया था। जाखड़ की याचिका में कहा गया है कि सत्य निकेतन घटना “उस जोखिम की गंभीर चेतावनी है जो हजारों छात्रों को झेलनी पड़ रही है, जो अपने कॉलेजों में पर्याप्त छात्रावास सुविधाओं के अभाव में निजी पीजी पर निर्भर हैं।” उन्होंने सुझाव दिया कि जहां कॉलेज परिसर में पर्याप्त भूमि उपलब्ध हो, वहां छात्रावास बनाए जाएं अथवा विस्तार किया जाए, तथा भूमि की कमी वाले कॉलेजों के लिए निकटवर्ती कॉलेजों के छात्रों हेतु सामूहिक छात्रावास विकसित किए जाएं। याचिका में विश्वविद्यालय-व्यापी नीति बनाने की मांग करते हुए कहा गया है कि अधिकारियों को “दिल्ली विश्वविद्यालय के
स्रोत: The Indian Express
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