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**मिशन आगमन का रहस्योद्घाटन: कैसे स्काईरूट के विक्रम-1 ने इतिहास रचा**
भारत के पहले निजी तौर पर विकसित कक्षीय रॉकेट विक्रम-1 के सफल प्रक्षेपण ने देश के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत की है। 18 जुलाई, 2026 को स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा निर्मित विक्रम-1 ने श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी और महज 15-17 मिनट में लगभग 450 किलोमीटर की कक्षा में अपने पेलोड्स को स्थापित कर दिया। इस मिशन ‘आगमन’ (जिसका अर्थ है ‘आगमन’) के साथ भारत संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद तीसरा ऐसा देश बन गया, जिसने निजी क्षेत्र द्वारा विकसित कक्षीय प्रक्षेपण क्षमता हासिल की। यह उपलब्धि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में सरकारी एकाधिकार से मुक्त होकर बहु-हितधारक पारिस्थितिकी तंत्र की ओर बढ़ने का प्रमाण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्काईरूट को बधाई दी, जबकि इन-स्पेस के अध्यक्ष पवन गोयनका ने इसे ‘भारत क्षण’ बताया। विक्रम-1 एक चार-चरणीय रॉकेट है, जो मुख्य रूप से कार्बन-कम्पोजिट सामग्रियों से निर्मित है और इसका वजन कम रखा गया है। इसके तीन ठोस ईंधन चरण ‘कलाम-1200’, ‘कलाम-250’ और ‘कलाम-100’ पूर्व राष्ट्रपति और रॉकेट वैज्ञानिक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम पर हैं, जबकि अंतिम चरण एक तरल ईंधन वाला ‘ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल’ (ओएएम) है, जो 3डी प्रिंटेड इंजन से लैस है। यह मॉड्यूल अंतरिक्ष में बार-बार प्रज्वलित हो सकता है, जिससे उपग्रहों को सटीक कक्षा में स्थापित किया जा सके।
विक्रम-1 की सफलता भारत के अंतरिक्ष सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसकी शुरुआत 2020 के बाद हुई जब सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला। इसरो, इन-स्पेस, अंतरिक्ष विभाग और भारतीय अंतरिक्ष नीति 2
स्रोत: Times of India
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