✎ उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति में रोहिणी घावरी के प्रयासों से वाल्मीकि समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना बढ़ रही है।
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यूपी की राजनीति में नए दलित चेहरे के तौर पर रोहिणी घावरी की एंट्री से प्रदेश की राजनीति में एक नया मोर्चा खुलता दिख रहा है। स्विट्जरलैंड से लौटने के बाद रोहिणी घावरी वाल्मीकि समाज को एकजुट कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उन 21 विधानसभा सीटों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, जहां वाल्मीकि मतदाताओं की भूमिका निर्णायक मानी जाती है। इन सीटों पर आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर का प्रभाव रहा है, लेकिन रोहिणी उनके वोट बैंक पर निशाना साध रही हैं। उनका लक्ष्य वाल्मीकि समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिलाना और अगले पांच साल में किसी राज्य में मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने का है। रोहिणी ने वाल्मीकि समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी को उजागर करते हुए इन क्षेत्रों में अभियान चलाने की तैयारी में हैं, जिससे 2027 के विधानसभा चुनाव में नए समीकरण बन सकते हैं।
रोहिणी घावरी की राजनीतिक सक्रियता सपा प्रमुख अखिलेश यादव से उनकी मुलाकात के बाद और बढ़ गई है, जिससे पश्चिमी यूपी में दलित वोटों के नए समीकरण बनने की संभावना है। उन्होंने चंद्रशेखर पर शादी का वादा कर शोषण करने के आरोप लगाए हैं, जिससे उनके राजनीतिक उद्देश्यों को बल मिल रहा है। दलित राजनीति में जाटव मतदाताओं के प्रभाव के बीच वाल्मीकि समाज को अलग राजनीतिक ताकत के तौर पर लामबंद करने की कोशिश 2027 के चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर निर्णायक साबित हो सकती है। यह घटनाक्रम बैंकिंग, एसएससी और आरबीआई ग्रेड बी जैसी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जहां राजनीतिक घटनाक्रम और समाजिक गतिशीलता से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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