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भारत ने हाल ही में आर्मेनिया के येरेवन में आयोजित जैव विविधता संधि (सीबीडी) के पक्षकारों के 17वें सम्मेलन (कॉप-17) में जैव विविधता संरक्षण, जैव सुरक्षा तथा पहुंच एवं लाभ साझाकरण पर चार प्रमुख प्रकाशन जारी किए। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने इस अवसर पर वैश्विक जैव विविधता प्रतिबद्धताओं को प्रभावी कार्यान्वयन, सतत वित्तपोषण और दीर्घकालिक संरक्षण परिणामों में बदलने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा का उल्लेख करते हुए कहा कि देशों को केवल लक्ष्य निर्धारित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें उन लक्ष्यों को लागू करने के लिए आवश्यक क्षमता विकसित करनी चाहिए। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और विकास को एक-दूसरे का पूरक बनाने पर जोर दिया तथा प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाए रखने में सतत विकल्पों और जिम्मेदार उपभोग के महत्व को रेखांकित किया।
इन प्रकाशनों में भारत के अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों (आई-ओईसीएम) के लिए दिशा-निर्देश, कार्टाजेना जैव सुरक्षा प्रोटोकॉल पर पांचवीं राष्ट्रीय रिपोर्ट, जैव विविधता संधि पुस्तिका तथा भारत की पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (एबीएस) की सफलता की गाथा शामिल हैं। ये प्रकाशन संरक्षण संबंधी योगदानों की पहचान, संस्थागत समझ को मजबूत करने तथा कार्यान्वयन की प्रगति पर रिपोर्टिंग करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। श्री यादव ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग, दक्षिण-दक्षिण सहयोग तथा व्यावहारिक ज्ञान के आदान-प्रदान के माध्यम से वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा के उद्देश्यों को प्राप्त करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी देश अकेले इन उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सकता और इसके लिए ठोस दिशा-निर्देश, विश्वसनीय जानकारी तथा सार्वजनिक जवाबदेही की आवश्यकता है।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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