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क्यों नहीं हो सकता चीतों का सैटेलाइट कॉलर से लाइव ट्रैकिंग? जानिए Kuno निदेशक का जवाब
उपग्रह हार के माध्यम से चीतों पर नज़र रखनाहार लगानाचीतों को हार पहनानासिग्नल भेजनास्थिति भेजनाडेटा प्राप्त करनास्थिति जाननास्थिति विश्लेषणस्थिति का मूल्यांकन
उपग्रह हार के माध्यम से चीतों पर नज़र रखना

प्रासंगिकता — Banking, SSC & RBI Grade B exams: Science & Technology

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सैटेलाइट कॉलर से चीतों को लाइव ट्रैक क्यों नहीं किया जा सकता? कुनो नेशनल पार्क के निदेशक उत्तम कुमार शर्मा ने बताया है कि सैटेलाइट कॉलर से मिलने वाली लोकेशन अपडेट रियल-टाइम नहीं होती, बल्कि यह समय-समय पर मिलने वाले डेटा पॉइंट्स होते हैं। जैसे ही टीम को लोकेशन मिलती है, चीतों के वहां से हटने की संभावना रहती है, जिससे निरंतर निगरानी संभव नहीं हो पाती। कॉलर हर 6 घंटे में लोकेशन भेजते हैं, लेकिन तकनीकी खराबी या भू-भाग संबंधी बाधाओं के कारण यह अंतराल बढ़ सकता है। ऐसे में, अगर कोई अपडेट मिस हो जाए, तो अगली लोकेशन आने तक टीम को इंतजार करना पड़ता है। यह तकनीक महंगी भी है, जिसका खर्च लगभग 4-5 लाख रुपये प्रति कॉलर आता है। ऐसे में बैटरी लाइफ और ट्रांसमिशन फ्रीक्वेंसी के बीच संतुलन बनाना जरूरी होता है।

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कुनो पार्क में चीतों की निरंतर निगरानी इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि ये जानवर बेहद गतिशील होते हैं और रोजाना 6-8 किलोमीटर तक चलते हैं। कभी-कभी तो उनकी रोजाना की दूरी 12-15 किलोमीटर तक पहुंच जाती है। ऐसे में, जब टीम कॉलर से मिली लोकेशन पर पहुंचती है, तब तक चीतों के वहां से हटने की संभावना रहती है। इसके अलावा, घने जंगल, चट्टानी इलाके और खराब सैटेलाइट रिसेप्शन जैसी चुनौतियां भी ट्रैकिंग में बाधा बनती हैं। ऐसे में, निरंतर निगरानी के लिए टीमों को तकनीकी समझ, समन्वय और शारीरिक मेहनत की जरूरत होती है। यह तकनीक वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ तकनीकी सीमाओं को भी उजागर करती है, जो बैंकिंग, एसएससी और आरबीआई ग्रेड बी परीक्षाओं के लिए भी प्रासंगिक है।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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