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राष्ट्रीय इस्पात नीति 2047: संरक्षणवाद से प्रतिस्पर्धा की ओर बदलाव
राष्ट्रीय इस्पात नीति 2047: संरक्षणवाद से प्रतिस्पर्धा की ओर बदलाव — भारत की इस्पात नीति: संरक्षण से प्रतिस्पर्धा की ओर
आरेख: भारत की इस्पात नीति: संरक्षण से प्रतिस्पर्धा की ओर

प्रासंगिकता — Banking, SSC & RBI Grade B exams: Polity & Governance

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भारत की इस्पात नीति 2047 को संरक्षणवाद से हटकर प्रतिस्पर्धा पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। वर्तमान में, भारतीय इस्पात उद्योग उच्च लाभप्रदता दर्शाता है, लेकिन यह दक्षता के बजाय कम लौह अयस्क कीमतों और आयात शुल्क जैसे संरक्षणवादी उपायों के कारण है। लौह अयस्क पर 30% निर्यात शुल्क घरेलू कीमतों को वैश्विक कीमतों से 30-40% कम रखता है, जिससे खनिज-समृद्ध क्षेत्रों को आर्थिक नुकसान होता है। इसके अतिरिक्त, 7.5% आयात शुल्क और 11.5% सुरक्षा शुल्क, कुल 18% का शुल्क बनाता है, जबकि आसियान में यह 3-4% है। गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCOs) जैसे गैर-टैरिफ बाधाएं भी मौजूद हैं। इन संरक्षणवादी नीतियों के कारण घरेलू फर्में जापान जैसे उच्च लागत वाले देशों की तुलना में 6-7% अधिक प्रीमियम पर स्टील बेचती हैं, जिससे डाउनस्ट्रीम उद्योगों जैसे निर्माण और ऑटोमोबाइल क्षेत्र को नुकसान होता है, और छोटे व मध्यम उद्योगों के लिए इनपुट लागत बढ़ जाती है। यदि ये नीतियां हटाई जाती हैं, तो प्रमुख इस्पात फर्मों की लाभप्रदता में भारी गिरावट आ सकती है, कुछ मामलों में यह नकारात्मक भी हो सकती है।

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बैंकिंग, एसएससी और आरबीआई ग्रेड बी जैसी परीक्षाओं के लिए यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आर्थिक नीतियों, औद्योगिक विकास और सरकार के नियामक ढांचे से संबंधित है। यह नीतिगत बदलावों के संभावित आर्थिक प्रभावों, जैसे उद्योगों की लाभप्रदता, निर्यात क्षमता और रोजगार सृजन पर असर को समझने में मदद करता है। बैंकिंग क्षेत्र के लिए, यह इस्पात उद्योग में निवेश और ऋण जोखिमों का आकलन करने में प्रासंगिक है, जबकि आरबीआई ग्रेड बी के लिए, यह व्यापक आर्थिक स्थिरता और औद्योगिक नीतियों के प्रभाव का विश्लेषण करने में सहायक है। एसएससी उम्मीदवारों के लिए, यह आर्थिक सुधारों, व्यापार नीतियों और भारत के वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता से संबंधित सामान्य ज्ञान और विश्लेषणात्मक कौशल को बढ़ाता है। फार्मास्यूटिकल्स और ऑटो कंपोनेंट्स जैसे उद्योगों ने दिखाया है कि संरक्षण में कमी से उद्योग को नुकसान नहीं होता, बल्कि निर्यात में वृद्धि होती है, जो इस्पात उद्योग के लिए भी एक संभावित मार्ग हो सकता है।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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