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**डीएचएमपी (धर्मेंद्र प्रधान) के शिक्षा कार्यकाल का लेखा-जोखा: उपलब्धियां, चुनौतियां एवं भविष्य की राह**
धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री रहते हुए पांच वर्षों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को लागू करने की दिशा में अनेक कदम उठाए गए, जिनमें राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचा, बहुविषयक शिक्षा एवं विकसित भारत शिक्षा अभियान प्रमुख थे। उनके कार्यकाल में ‘नipun भारत’ जैसी पहलों ने कोविड-जनित अधिगम क्षति को दूर करने का प्रयास किया, जिसके तहत कक्षा 3 तक के बच्चों को आधारभूत साक्षरता एवं गणितीय कौशल प्रदान करना था। हालांकि, एएसईआर 2024 के आंकड़े बताते हैं कि देश में अभी भी केवल 25% बच्चे ही दूसरी कक्षा के पाठ पढ़ पाते हैं, जबकि कक्षा 5 के स्तर में पूर्व-महामारी के समान स्थिति बनी हुई है। शिक्षकों के मानकीकरण हेतु ‘राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक’ (एनपीएसटी) एवं ‘राष्ट्रीय मेंटरिंग मिशन’ जैसे प्रयासों के बावजूद, कार्यान्वयन में कमी और जागरूकता की कमी जैसी चुनौतियां बनी रहीं। इसके अतिरिक्त, यूजीसी के नए नियमों, तीन-भाषा नीति एवं ‘स्वयं प्लस’ जैसे कौशल-शिक्षा एकीकरण प्लेटफार्मों ने शिक्षा प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव लाने का प्रयास किया, किंतु राज्यों के बीच विविधता एवं केंद्रीकरण के आरोपों ने बहस को जन्म दिया।
प्रधान के कार्यकाल की सबसे विवादास्पद पहल रही तीन-भाषा नीति, जिसे केंद्र द्वारा राज्यों को अनिवार्य रूप से लागू करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन से जोड़ा गया। तमिलनाडु द्वारा इसका विरोध किए जाने के बावजूद, पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों ने इसे स्वीकार कर लिया। सीबीएसई के स्कूलों में भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने के निर्णय ने अंग्रेजी एवं विदेशी भाषाओं के महत्व पर पुनर्विचार को भी जन्म दिया। शिक्षा क्षेत्र में तकनीकी एकीकरण के प्रयासों में ‘एआई फॉर ऑल’ जैसे पाठ्यक्रमों ने 1 लाख से अधिक प्रतिभागियों को आकर्षित किया
स्रोत: The Hindu
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