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Right to be forgotten: Karnataka High Court directs authorities to mask acquitted woman’s name from online records — concept mind map
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Right to be forgotten

✎ डिजिटल युग में स्मरण से अधिकार व्यक्ति की निजता और गरिमा की रक्षा करता है।

प्रासंगिकता — Banking, SSC & RBI Grade B exams: Polity

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने डिजिटल युग में ‘भूलने के अधिकार’ (राइट टू बी फॉरगॉटन) की महत्ता को रेखांकित करते हुए एक महिला के नाम को ऑनलाइन रिकॉर्ड से हटाने का निर्देश दिया है, जिसे 2019 में Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956 के तहत आरोपों से बरी किया गया था। न्यायालय ने कहा कि डिजिटल खोज परिणामों में पुराने आरोपों का बार-बार प्रदर्शन व्यक्ति के जीवन पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालता है, जो न्यायिक निर्णय की गरिमा को कमजोर करता है। न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने उच्च न्यायालय, बेंगलुरु सिटी सिविल न्यायालय, राज्य पुलिस, गूगल और इंडियन कानून पोर्टल को निर्देश दिया कि वे महिला के नाम को उनके डिजिटल रिकॉर्ड से हटा दें, ताकि इंटरनेट से उसका अपराध से जुड़ाव पूरी तरह मिटाया जा सके। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायिक बरी होना केवल एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यक्ति की निर्दोषता का एक गंभीर घोषणापत्र है, जिसे डिजिटल दुनिया में भी बरकरार रखा जाना चाहिए।

इस मामले की प्रासंगिकता बैंकिंग, एसएससी और आरबीआई ग्रेड बी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें डिजिटल अधिकार, गोपनीयता और न्यायिक प्रक्रिया के बीच संतुलन को दर्शाया गया है। बैंकिंग क्षेत्र में, ग्राहकों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और डिजिटल पहचान के संरक्षण पर जोर दिया जाता है, जो ‘भूलने के अधिकार’ के सिद्धांत से मेल खाता है। आरबीआई ग्रेड बी जैसी परीक्षाओं में डेटा सुरक्षा और साइबर कानून जैसे विषयों से प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनमें इस प्रकार के न्यायिक निर्णयों का उल्लेख किया जा सकता है। इसके अलावा, एसएससी परीक्षाओं में मौलिक अधिकार, डिजिटल इंडिया और साइबर सुरक्षा जैसे विषयों पर आधारित प्रश्नों के लिए यह मामला एक अच्छा उदाहरण हो सकता है।

स्रोत: The Hindu


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