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Exhorbitant price of patented life-saving medicines: Kerala HC reserves verdict — concept mind map

✎ जीवनरक्षक दवाओं की ऊंची कीमतों पर न्यायिक हस्तक्षेप और जनहित के मुद्दे पर केरल HC का फैसला महत्वपूर्ण।

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केरल उच्च न्यायालय ने पेटेंट जीवन रक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमत को लेकर चल रहे स्वतः संज्ञान मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह मामला शुरू में एक स्तन कैंसर पीड़िता द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ था, जिसने रिबोसाइक्लिब नामक दवा ले रही थी, किंतु मामला लंबित रहने के दौरान ही उसका निधन हो गया था। उसने सरकार को इस दवा के पेटेंट को हस्तांतरित कर इसे न्यूनतम संभव कीमत पर उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग की थी। न्यायालय ने सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए इस मामले को स्वतः संज्ञान में लिया तथा मालाप्पुरम की एक अन्य स्तन कैंसर पीड़िता को भी इस मामले में जोड़ा। न्यायालय ने विशेषज्ञ राय भी मांगी थी कि क्या पेटेंट मुक्त सस्ती दवा, जो स्थानीय स्तर पर निर्मित होती है, का इस्तेमाल स्तन कैंसर के उपचार में किया जा सकता है। मामले में न्याय मित्र द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया कि दोनों दवाओं के नैदानिक एवं विषाक्तता प्रोफाइल अलग हैं तथा इनका परस्पर स्थानापन्न नहीं किया जा सकता।

इस मामले का बैंकिंग, एसएससी एवं आरबीआई ग्रेड बी परीक्षाओं के लिए महत्व इसलिए है क्योंकि इसमें पेटेंट कानून, दवा मूल्य नियंत्रण, सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति एवं न्यायिक सक्रियता जैसे विषय शामिल हैं, जो नीति निर्माण एवं प्रशासनिक तंत्र से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। बैंकिंग क्षेत्र में फार्मास्यूटिकल कंपनियों के वित्तीय स्वास्थ्य, पेटेंट से जुड़े कानूनी मुद्दों तथा सरकारी हस्तक्षेप के आर्थिक प्रभावों पर प्रश्न पूछे जा सकते हैं। एसएससी परीक्षाओं में इस विषय से संबंधित संवैधानिक प्रावधान, नीति निर्माण प्रक्रिया एवं न्यायपालिका की भूमिका पर आधारित प्रश्नों की संभावना रहती है। आरबीआई ग्रेड बी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं में सार्वजनिक नीति, स्वास्थ्य अर्थशास्त्र एवं न्यायिक सक्रियता जैसे विषयों पर विस्तृत विश्लेषणात्मक उत्तर की अपेक्षा की जाती है, जिसमें इस मामले से प्रासंगिकता रखने वाले बिंदुओं का उल्लेख किया जा सकता है।

स्रोत: The Hindu


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