✎ मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण में बदलाव की आवश्यकता, मॉडलों की सीमाओं और नए आर्थिक संकेतकों की ओर ध्यान देना।
प्रासंगिकता — Banking, SSC & RBI Grade B exams: Economy
**मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण पर पुनर्विचार का समय**
विश्व के प्रमुख केंद्रीय बैंकों ने 2007-08 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद दशकों तक मुद्रास्फीति की उपेक्षा करते हुए मंदी के दबावों से निपटने पर ध्यान केंद्रित किया। इस दौरान अर्थशास्त्रियों का ध्यान भी दीर्घकालिक मंदी (सेकुलर स्टैगनेशन) और इसके मौद्रिक नीति पर प्रभाव पर केंद्रित रहा। हालांकि, 2021 से स्थिति बदल गई जब दोहरे अंकों की मुद्रास्फीति आम हो गई। केंद्रीय बैंक इस बदलाव से आश्चर्यचकित रह गए और उन्होंने इसका कारण कोविड-19 महामारी को बताया, जबकि वास्तविकता में पारंपरिक नव-केनेसियन मॉडलों की विफलता थी। इन मॉडलों ने आर्थिक व्यवधानों के कारण मुद्रास्फीति के पूर्वानुमान में गंभीर त्रुटियां कीं। विशेष रूप से, अमेरिका में M2 मुद्रापूर्ति में 25% की वृद्धि के बावजूद, बैंकों ने इसे नजरअंदाज कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। केवल अमेरिकी फेडरल रिजर्व के तत्कालीन अध्यक्ष केविन वार्ष ने इस कमी को स्वीकार करते हुए नीति की समीक्षा के लिए स्वतंत्र कार्यबल स्थापित किए।
मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की रणनीति मौद्रिक विकास और वित्तीय बाजारों के जोखिमों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं करती, जिससे नीति निर्माताओं को गलत निर्णय लेने पड़ते हैं। यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) की “दो-स्तंभ रणनीति” ने वास्तविक अर्थव्यवस्था और मुद्रापूर्ति के विश्लेषण को जोड़कर बेहतर परिणाम दिए थे, लेकिन 2021 में इस रणनीति को छोड़ दिया गया। अब आवश्यकता है कि केंद्रीय बैंक अपने मौद्रिक नीति ढांचे का पुनर्मूल्यांकन करें, ताकि आर्थिक अनिश्चितताओं के प्रति लचीला दृष्टिकोण अपनाया जा सके। यह विषय बैंक पीओ, एसएससी और आरबीआई ग्रेड बी परीक्षाओं के लिए अत्यंत प्रासंगिक है, जहां मौद्रिक नीति, मुद्रास्फीति नियंत्रण और केंद्रीय बैंकिंग प्रणाली के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पहलुओं पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
स्रोत: orissapost.com
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