✎ डीजीपी नियुक्ति में स्वतंत्रता और पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है।
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**सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार और केंद्र के बीच डीजीपी नियुक्ति में “पूर्वनियोजित मिलीभगत” का आरोप लगाया**
सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पी चिदंबरम ने कहा कि ओडिशा सरकार और केंद्र सरकार ने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी सुशांत कुमार नाथ के इंटिग्रिटी सर्टिफिकेट को केवल सीबीआई के एक संचार के आधार पर वापस लेने में “पूर्वनियोजित मिलीभगत” की है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने अन्य अधिकारियों को पदोन्नति देने के लिए दो अस्थायी गैर-कार्यकारी पद सृजित किए थे। कोर्ट ने 2006 के प्रकाश सिंह मामले के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस नियुक्तियों में कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्त रखने के लिए यूपीएससी द्वारा तैयार तीन वरिष्ठ अधिकारियों की सूची से डीजीपी चुना जाना चाहिए। अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि ओडिशा सरकार ने प्रकाश सिंह मामले के फैसले को कमजोर करने का प्रयास किया है, जिससे पुलिस नियुक्तियों में पारदर्शिता खत्म हो रही है।
इस मामले में न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा डीजीपी नियुक्तियों में यूपीएससी की भूमिका को दरकिनार करने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने कहा कि छोटे राज्यों में डीजीपी पदों के लिए पर्याप्त अधिकारी न होने के बावजूद नियमों को तोड़कर मनमानी नियुक्तियां की जा रही हैं। उदाहरण के लिए, झारखंड डीजीपी तड़ाशा मिश्रा को केवल छह महीने के शेष कार्यकाल के कारण बनाए रखा गया, जबकि नियमों के अनुसार उन्हें छह माह का शेष कार्यकाल पूरा करना अनिवार्य था। इस प्रकार के मामलों से स्पष्ट है कि सरकारें पुलिस नियुक्तियों में हस्तक्षेप कर रही हैं, जिससे लोकतंत्र के संस्थानों की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। यह मुद्दा बैंक पीओ, एसएससी और आरबीआई ग्रेड बी जैसी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनमें शासन व्यवस्था, संवैधानिक प्रावधान और न्यायपालिका की भूमिका से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।
स्रोत: orissapost.com
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