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केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित जनजातियों का पुनर्वास — concept mind map

✎ केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत जनजातीय पुनर्वास के लिए राज्य सरकारों द्वारा राष्ट्रीय नीति के अनुसार कार्यवाही सुनिश्चित की जा रही है।

केन-बेतवा लिंक परियोजनाजनजातीय कार्य मंत्रालयनिगरानीअनुमोदनकेन-बेतवा लिंक प्राधिकरणभूमि अधिग्रहणपुनर्वासनराज्य सरकारेंयोजना कार्यान्वयनप्रगतिपीएएफ (1,913)विस्थापनजनसंख्या 8,339अजजा-पीएएफ (648)विस्थापनयोजना मंजूरी
केन-बेतवा लिंक परियोजना

प्रासंगिकता — Banking, SSC & RBI Grade B exams: Polity & Governance

केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित जनजातियों के पुनर्वास पर जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा जारी नवीनतम प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, राज्य सरकारों द्वारा भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वासन और पुर्नस्थापन गतिविधियां की जा रही हैं। जनजातीय कार्य मंत्रालय केन-बेतवा लिंक परियोजना की संचालन और निगरानी समितियों का सदस्य है, जो परियोजना प्रभावित परिवारों (पीएएफ) के पुनर्वासन और पुर्नस्थापन की कार्य योजना के कार्यान्वयन की निगरानी करता है। इस परियोजना के चरण-I में कुल 1,913 पीएएफ (जनसंख्या 8,339) प्रभावित हुए, जिनमें 648 अनुसूचित जनजाति के परिवार शामिल हैं। मंत्रालय को अभी तक ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली है जिसमें मुआवजा राशि का संवितरण दर्ज हो लेकिन लाभार्थियों तक नहीं पहुंचने के मुद्दे सामने आए हैं। हालांकि, विभिन्न अभ्यावेदनों के माध्यम से विस्थापन संबंधी मुद्दों को उठाया गया है, जिनकी जांच कर उन्हें मध्य प्रदेश सरकार और संबंधित जिला प्रशासनों को भेज दिया गया है। अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के तहत वन अधिकारों के निपटारे के लिए राज्य सरकारों को निर्देशित किया गया है, ताकि किसी भी हकदार लाभार्थी को उसके वन अधिकारों से वंचित न किया जाए।

इस मुद्दे की प्रासंगिकता बैंकिंग, एसएससी और आरबीआई ग्रेड बी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें सरकारी नीतियों, पुनर्वास योजनाओं, वन अधिकार कानूनों और केंद्र-राज्य समन्वय जैसे विषय शामिल हैं। परीक्षाओं में अक्सर सरकारी योजनाओं, अधिनियमों और उनके कार्यान्वयन के तंत्र पर प्रश्न पूछे जाते हैं, जो इस मामले में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इसके अलावा, पर्यावरणीय और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दे भी विभिन्न परीक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल होते हैं, जिससे इस विषय की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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