✎ जीडीपी वृद्धि के आंकड़े प्रभावशाली होते हुए भी रोजगार और घरेलू राहत में समान तेजी नहीं दिख रही, जिससे आर्थिक असमानता बढ़ रही है।
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**मजबूत जीडीपी, कमजोर घरेलू राहत**
हाल ही में केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.8% रहने की घोषणा की है। नाममात्र जीडीपी में 10.3% और वास्तविक सकल मूल्यवर्धित (GVA) में 8.2% की वृद्धि हुई है। निवेश में 11.9%, घरेलू खपत में 7.1% और निर्यात में 12% की वृद्धि दर्ज की गई है। ये आंकड़े निश्चित रूप से प्रभावशाली हैं और सरकार ने इन्हें आर्थिक लचीलेपन एवं विकास का प्रमाण बताया है। हालांकि, इन संख्याओं के पीछे एक दूसरा भारत भी है, जहां बेरोजगार युवा, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक, प्रवासी मजदूर और आम परिवार अपनी जीवनशैली बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सवाल उठता है कि जब जीडीपी इतनी तेजी से बढ़ रही है, तो आर्थिक राहत घरों तक इतनी धीमी गति से क्यों पहुंच रही है? पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने इस बात पर सवाल उठाया है कि इतनी मजबूत जीडीपी वृद्धि के बावजूद रोजगार सृजन, निवेश और अन्य आर्थिक संकेतकों में समान गति क्यों नहीं दिखाई दे रही। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने तो यहां तक कहा है कि नए आधार वर्ष (2022-23) के हिसाब से वृद्धि दर केवल 2.6% तक दिखाई दे सकती है। कांग्रेस ने इन आलोचनाओं का राजनीतिक लाभ उठाते हुए सरकार के आर्थिक दावों पर हमला बोला है। हालांकि, सरकार और MoSPI ने इन तुलनाओं को खारिज करते हुए कहा है कि भारत ने जीडीपी के नए आधार वर्ष (2022-23) को अपनाया है, जिसमें नई प्रशासनिक डेटा और पद्धतिगत बदलाव शामिल हैं, जैसे विनिर्माण क्षेत्र में दोहरा अपस्फीति (double deflation)।
जीडीपी वृद्धि दर उत्पादन को मापती है, न कि समृद्धि के वितरण को। एक उच्च तकनीक वाली फैक्ट्री बिना समानुपाती रूप से र
स्रोत: orissapost.com
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