प्रासंगिकता — Banking, SSC & RBI Grade B exams: Polity
निर्वाचन आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में दायर अपने हलफनामे में कहा कि विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) से संबंधित सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। फॉर्म 6, जो मतदाता नामांकन के लिए एक वैधानिक प्रपत्र है, में जुलाई में किए गए ऑनलाइन परिवर्तन को लेकर चुनौतियां उठाई गई थीं। दो चुनाव आयुक्तों ने लिखा था कि फॉर्म 6 में संशोधन केवल कानून मंत्रालय द्वारा ही किया जा सकता है, इसलिए इस तरह का बदलाव अवैध था। भारतीय चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि फॉर्म 6 में जो घोषणा जोड़ी गई थी, वह केवल एसआईआर अवधि के दौरान मतदाताओं को अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने से बचाने के लिए थी। इस घोषणा को 30 सितंबर को पोर्टल से हटा लिया गया था। आयोग ने अब ऑनलाइन फॉर्म 6 को दो भागों में विभाजित करने का निर्णय लिया है—एक सामान्य फॉर्म 6 और दूसरा एसआईआर घोषणा फॉर्म। इससे नए मतदाता बिना किसी अतिरिक्त दस्तावेज के अपना नामांकन कर सकेंगे।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाने के खिलाफ दायर अपीलों पर भी चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि ये अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय द्वारा दायर की गई थीं। आयोग ने कहा कि ये अधिकारी जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत अधिकारियों के रूप में कार्य कर रहे थे। इससे पहले फरवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल की 60.06 लाख मतदाताओं की पात्रता की जांच के लिए न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया था, जिनमें से 27.16 लाख नाम हटा दिए गए थे। आयोग ने बताया कि कुल 38.31 लाख अपीलें दायर की गई थीं, जिनमें से 22.21 लाख नाम हटाए गए मतदाताओं द्वारा और 16.10 लाख अन्य पक्षों द्वारा दायर की गई थीं। यह मामला आयोग के भीतर भी चर्चा का विषय रहा है, जहां चुनाव आयुक्तों ने पूछा था कि किन अधिकारियों ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने के खिलाफ अपील दायर की थी।
स्रोत: The Indian Express
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