✎ बायोई3 नीति जैव विनिर्माण को बढ़ावा देकर स्वदेशी क्षमताओं का विकास और रोजगार सृजन करती है।
प्रासंगिकता — Banking, SSC & RBI Grade B exams: Polity & Governance
**बायोई3 नीति का योगदान**
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में बताया कि जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) ने बायोई3 नीति के तहत जैव विनिर्माण केंद्रों और जैव फाउंड्री की स्थापना के लिए छह विषयगत क्षेत्रों की पहचान की है, जिनमें जैव-आधारित रसायन, बायोप्लास्टिक्स, सक्रिय फार्मास्युटिकल तत्व, कार्यात्मक खाद्य पदार्थ, सटीक जैव चिकित्सा और जलवायु प्रतिरोधी कृषि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, पांच प्राथमिकता वाले क्षेत्रों जैसे आयुर्वेद कृषि नवाचार, जीनोम निदान, संश्लेषित जीव विज्ञान, बायोमोलेक्यूलर डिज़ाइन और बायोमैन्युफैक्चरिंग हब को भी इस नीति में शामिल किया गया है। इन केंद्रों की स्थापना के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्ताव आमंत्रित किए जाते हैं, जिनका कठोर बहुस्तरीय मूल्यांकन किया जाता है। चयनित प्रस्तावों को तकनीकी और वित्तीय मानदंडों के आधार पर अनुमोदित किया जाता है, जिसमें 70 प्रतिशत तक सरकारी वित्तीय सहायता और शेष 30 प्रतिशत निजी क्षेत्र का योगदान शामिल है।
बायोई3 नीति के कार्यान्वयन से अगले पांच वर्षों में द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में लगभग 1500 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित होने की संभावना है। यह नीति स्वदेशी जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्टार्ट-अप, एमएसएमई और निजी उद्योग की भागीदारी को प्रोत्साहित कर रही है। इसके माध्यम से वर्ष 2030 तक 300 अरब डॉलर की जैव-अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। इस नीति के तहत अब तक 600 से अधिक लाभार्थियों को सुविधाओं का लाभ मिल चुका है, और निजी क्षेत्र से 602.09 करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिबद्धता प्राप्त हुई है। यह पहल मेक-इन-इंडिया को बढ़ावा देने के साथ-साथ जैव प्रौ
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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