✎ न्यायिक अधिकारी को अभियोक्ता नियुक्त करने से सैन्य कर्मियों के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर असर नहीं पड़ता।
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केरल उच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा कि नौसेना (अनुशासन एवं विविध उपबंध) विनियम, 1965 के अनुसार एक जांच अधिकारी को भी नौसेना के कोर्ट-मार्शल मामले में अभियोजक नियुक्त किया जा सकता है, और इससे अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होगा। न्यायमूर्ति के. नटराजन और जॉनसन जॉन की खंडपीठ ने माना कि संविधान, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973, नौसेना अधिनियम, 1957 और नौसेना विनियमों के संयुक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सशस्त्र बलों से संबंधित मामलों में सैन्य कर्मियों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। ऐसे मामलों में, अभियोजक और जांच अधिकारी दोनों ही कोर्ट-मार्शल के साक्षी बन सकते हैं। न्यायालय ने माना कि यदि जांच अधिकारी को अभियोजक नियुक्त किया जाता है, तो वह स्वयं साक्षी के रूप में भी प्रस्तुत हो सकता है।
इस मामले में याचिकाकर्ता एक नौसैनिक अधिकारी थे, जिन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार नहीं मिला, क्योंकि उसी अधिकारी ने उनकी जांच की और साथ ही अभियोजक के रूप में भी कार्य किया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें आवश्यक दस्तावेजों तक पहुंच नहीं मिली और अपने बचाव का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। हालांकि, एकल पीठ ने इस विनियम की संवैधानिकता को बरकरार रखा, लेकिन यह भी कहा कि यदि वही अधिकारी अभियोजक और जांचकर्ता दोनों की भूमिका निभाए, तो निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्रभावित हो सकता है। केंद्र सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि नौसेना अधिनियम के तहत सैन्य कर्मियों के मौलिक अधिकारों में संशोधन संभव है। उच्च न्यायालय ने केंद्र के तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि जांच अधिकारी ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति है, क्योंकि उसे मामले की पूरी जानकारी होती है। यह फैसला बैंक पीओ, आईबीपीएस, एसबीआई, आरबीआई ग्रेड बी और एसएससी जैसी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे प्रशासनिक एवं संवैधानिक विषयों पर दृष्टिकोण विकसित होता है, जो सामान्य जागरूकता और कानूनी ज्ञान के लिए आवश्यक है।
स्रोत: The Hindu
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